शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

! जम्मू-कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री जी की दलील !

दो दशक के प्रयास के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकियों पर सुरक्षा बलों को मिली बढ़त इस साल कमजोर पड़ने लगी है । पिछले साल की तुलना में इस साल आतंकियों के शिकार बने सुरक्षा बल के जवानों की संख्या सात गुना बढ़ चुकी है । वहीं मारे गए आतंकियों की संख्या में एक चौथाई कमी आई है । सुरक्षा एजेंसियों को डर है कि यदि ऐसा ही रहा तो घाटी में एक बार फिर 90 के दशक की स्थिति दोहराई जा सकती है । गृह मंत्रालय के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक 2012 में आतंकी हमले में सुरक्षा बलों के सात जवान शहीद हुए थे, लेकिन इस साल इनकी संख्या बढ़कर 48 हो चुकी है । जबकि साल के तीन महीने अभी शेष बचे हैं । इसके उल्टे पिछले साल सुरक्षा बलों ने कुल 48 आतंकियों को मार गिराया था, लेकिन इस साल अभी तक केवल 39 आतंकी ही मारे गए हैं । आतंकियों के हाथों मारे जाने वाले निर्दोष नागरिकों की संख्या भी नौ से बढ़कर 10 हो चुकी है । यही हाल गिरफ्तार आतंकियों को लेकर है । पिछले साल कुल 98 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन इस साल अभी तक केवल 66 आतंकी गिरफ्तार किए जा सके हैं ।

गृहमंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 90 के दशक में घाटी में आतंक चरम पर था । लेकिन 2000 के बाद इसमें लगातार कमी आती गई । 2002 में जहां 2020 आतंकी मारे गए थे और सुरक्षा बलों के 536 जवान शहीद हुए थे । 2011 तक आते-आते इनकी संख्या कम होकर क्रमश: 100 और 33 रह गईं थी । इसके बाद 2012 से घाटी में शांति की फिजा को भंग करने की पाकिस्तान की ओर कोशिश शुरू हुई और आतंकियों की घुसपैठ के लिए पाक सेना की ओर से फायरिंग की घटनाएं बढ़ गई। पिछले साल जहां सीमा पर फायरिंग की कुल 117 घटनाएं हुईं थी, इस साल उनकी संख्या अभी तक 144 हो चुकी हैं।

वैसे पाक की तमाम कोशिशों के बावजूद घाटी में आतंकियों की संख्या पिछले साल की तुलना में कोई इजाफा नहीं हुआ है। घाटी में पिछले साल की तरह अब भी लगभग 220 प्रशिक्षित आतंकी सक्रिय हैं। जबकि पाकिस्तान में आतंकियों के प्रशिक्षण के लिए 42 कैंप चल रहे हैं। इनमें 25 पाक अधिकृत कश्मीर और 17 पाकिस्तान के दूसरे इलाकों में हैं । इन कैंपों में लगभग 2500 आतंकियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है ।

सरकार इन प्रशिक्षण केन्द्रों को कब नष्ट करगी ? इस बात का अभी तक कोई योजना है क्या सरकार के पास ?  इस तरह की आतंकी घटनाओं में ब्रिधि के क्या कारण है ?   सराकर पकिस्तान प्रायोजित इस आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए कोई एजेंडा है क्या ?  ऐसे बहुत से प्रश्न है मन में कितने लिखू ? 
       इन आकड़ो के बाद भी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य में आतंकवाद के घटते असर के मद्देनजर वहां सुरक्षा बलों की मौजूदगी कम करने की मांग की है
                      दिल्ली में आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में  उमर अब्दुल्ला ने  कहा कि चूंकि राज्य में पिछले वर्ष से आतंकवाद संबंधी घटनाओं में लगातार कमी आई है । ऐसे में यहां सुरक्षा बलों की मौजूदगी में भी लगातार कमी करने की जरूरत है, ताकि राज्य के लोगों को बदले हुए माहौल का असर साफ दिखाई दे ।

       सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून [अफस्पा] की क्रमिक वापसी की मांग करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में जब आतंकवाद अपने चरम पर था, (मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जी के अनुसार इस समय आतंकी घटनाएं कम हुई है ) उस दौरान सेना और अ‌र्द्धसैनिक बलों के लिए यह बहुत उपयोगी साबित हुआ है, लेकिन जो इलाके घुसपैठ और आतंकवाद की गतिविधियों से प्रभावित नहीं हैं, वहां से इसे हटाने की क्रमिक शुरुआत की जानी चाहिए। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने  कहा कि उनकी सरकार आतंकवाद के खिलाफ पूरी सख्ती की वकालत करती है, लेकिन मानवाधिकार का कोई उल्लंघन भी बर्दाश्त नहीं करना चाहती ।*(क्योकि हमारी सेना के जवान तो मानव है ही नहीं ?)

उमर की प्रमुख मांगें-

- सेना और अ‌र्द्धसैनिक बलों की तदाद घटाई जाए

- सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून क्रमिक तरीके से हटे

- कश्मीर पर केंद्रीय वार्ताकारों की रिपोर्ट पर तुरंत कार्यवाही हो

- पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से टेलीफोन संपर्क कायम हो

- पुलिस के आधुनिकीकरण में केंद्रीय मदद तेज हो

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