सोमवार, 19 नवंबर 2012

!! मूर्ति पूजा की सुरुआत !!

इतिहास के जानकारों ने मूर्ति पूजा की बुनियाद का आरंभ किया है, वह है कि संसार भर में पहले सात मंदिर बनाये गये थे। वह मंदिर सितारों(तारे) के थे, उनकी पूजा नहीं की जाती थी। अपितु प्राकृतिक प्रभावों का उपयोग लिया जाता था। इन सात मंदिरों में एक आदित्य का मंदिर भारत के मुल्तान के अंदर था। दूसरा मंदिर मक्का में था।, जो शनि का था। अल्साना मसऊदी बड़ा लेखक और यात्री था, उसने लिखा है कि-
इन्नवैतुल्हरामा वैते जुहेलुन (यरुजुज्जहव वा मुआदीन उलजौहर)
कि मक्का का मंदिर शनि का मंदिर है,
तीसरा मंदिर इस्फान पहाड़ पर है, चौथा मंदिर नौ बिहार में था, जिसे मनु चहरे ने बलख में बनवाया था, जो बहुत दूर जाता था। पाँचमा मंदिर गमदान यमन देश में था और जुहाक ने उसको शुक्र के नाम से बनवाया था। छठा मंदिर भी सूर्य का था जो खुरासान फरगाना में था। सातवाँ मंदिर चीन में था, यह बड़ा ही विचित्र मंदिर था, इसमें अपने आप कपड़ा बुना जाता था और लकड़ी की खड्डियाँ बनी होती थीं। जो वायु के प्रभाव से चलती थीं।
इन सब मंदिरों के सामने एक बड़ा हवन कुण्ड था। ये सभी मंदिर गृहों तारों के थे। इनकी पूजा नहीं होती थी। इनके प्रकृतिक उपयोग लिये जाते थे। जैसा चीन के मंदिर के विषय में लिखा गया दुनियाँ के इन सात मंदिरों के सामने हवन कुण्ड का होना इस बात का प्रभाण है कि इऩ मंदिरों को मानने वाले लोग वेद को मानते थे। इन मंदिरों का ईश्वर और ईश्वर की पूजा से कोई संबंध नहीं था। इनका भौतिक कार्यों में उपयोग होता था। फिर मंदिर तो गिरा दिये गये। एक मुल्तान और दूसरा मक्का का शेष रह गया। समय बदला और लोग प्राकृतिक उपयोग लेना भूल गये तथा पूजा आरंभ कर दी। साथ में बलिदान भी आरंभ कर दिया।………(मुरु जुज्जहब वा मुआदिनिल जौहर….भाग ४ पृष्ठ ४२ से ५४ तक)
मूर्ति पूजा का दूसरा और अल्लामामसऊदी ने इस प्रकार लिखा है-
जो लोग परमात्मा को नहीं मानते थे, जब उनके पूर्वज मर गये तो उन्होंने उनकी मूर्तियाँ बनाकर उन्हें पूजना आरंभ कर दिया।
इसके पश्चात मूर्ति पूजा का तीसरा दौर हजरत नूर के समय का मालुम होता है। उस समय के लोग विभिन्न पशु पक्षियों की मूर्तियाँ पूजने लगे। वह लोग जिन्होंने अपने पूर्वजों की मूर्तियाँ बनाई, जैन और बौद्ध लोग ही थे, क्योंकि वही भगवान को नहीं मानते थे। तब हिन्दु भी उनके मंदिरों में पूजा के लिये जाने लगे। इस बात को देखकर हिन्दुओं ने भी अपने पूर्वजों की मूर्तियाँ बनाई और उन्हें मंदिरों में रख दिया और कहा कि न गच्छेत जैन मंदिरम् हस्तिना नाडयमानोपिन न गच्छे जैन मंदिरम्।। अर्थात् हाथी से कुचले जाने पर भी कोई भी जैन मंदिर में न जाय। उन लोगों ने अपने तीर्थकरों ही मूर्तियाँ बनाई, मगर हिन्दुओं ने अपने तारों, देवताओं, देवियों, नदियों तथा पूर्वजों आदि की मूर्तियाँ बनाकर लोगों को मूर्ति पूजा में फंसा दिया और जैन बौद्ध मूर्तियों की तरफ उन्हें हटा दिया। इन सबमें शिवलिंग की पूजा लज्जाजनक होने पर भी शीघ्र फैल गई। इस अनात्य पूजा के कारण ही अधर्म ने अपना अड्डा जमा लिया और इसी ने भारत का विनाश कर दिया, और लाखों लोग विधर्मी होकर दूसरे धर्म में पलायन कर गये। और भारत की बहुमूल्य सम्पत्ति विदेशियों ने लूट ली।
उपरोक्त प्रसंग आचार्य देव प्रकाश / मौलवी अरबी फाजिल द्वारा लिखि पुस्तक मंदिरों की लूट / हिन्दुओं की बरबादी से पेज नंबर १० से १३ तक से लिया गया हैं।

मूर्ति पूजा और पश्चिम मतः-
बाईबिल को मानने वाले लोग भी मूर्ति पूजक थे। बाईबिल में बुतों को तोड़ने के आदेश दिये गये हैं, लेकिन वह बुत दूसरी जातियों के थे। पश्चिमी जातियों में बना इस्त्रईस का वंश बड़ा प्रसिद्ध है। यह वंश हजरत याकूब से चला था। याकूब अपनी ससुराल में रहता था, उसका विचार अपने पैतृक देश में आने का हो गया, वह वहाँ से अपना सारा सामान लेकर चला। तीसरे दिन उसके ससुर को पता चला कि याकूब भाग गया है। तब उसने अपने सात भाईयों को साथ लेकर याकूब का पीछा किया और जल्लाद के पहाड़ों में इससे जा मिला, उसने कहा कि अब तो तुझे अपने घऱ जाना है। क्योंकि तू वहाँ जाने का बहुत इच्छुक है। मगर तू मेरे इष्टदेवों को क्यों चुरा लाया है।
इसके उत्तर में याकूब ने कहा कि जिसके पास तू अपने इष्टदेवों (मूर्तियों) को पावे उसे आप जीवित मत छोड़ना, परन्तु याकूब नहीं जानता था कि उसकी पत्नि राखिल मूर्तियों को चुरा लाई है।...
इस पर लावन ने याकूब के सारे सामान की तलाशी ली, परन्तु मूर्तियाँ कहीं से न मिलीं तब वह राखिल के तम्बू में प्रविष्ट हुआ तब राखिल उन मूर्तियों को ऊँट के कजावे में
रखकर उसके ऊपर बैठी हुई थी, लावन ने सब कुछ खोजा परन्तु कुछ न पाया, फिर राखिल ने अपने पिता से कहा कि मैं आपके सामने उठ नहीं सकती क्योंकि मैं मासिक धर्म में हूँ, पता भी कैसे चलता क्योंकि राखिल मूर्तियों को ऊँट के कजावे में रखकर उसके ऊपर बैठी हुई थी।
--(उत्पत्ति पुस्तक अध्याय 31 पृष्ठ 56)
इतने बड़े पैगम्बर की बीबी अपने बाप की मूर्ति चुरा कर ले आई, इससे स्पष्ट है कि वह लोग मूर्तिपूजा करते थे। उसका वर्णन बाईबिल में इस प्रकार लिखा है कि तुम पराये बुतों की पूजा न करो, इससे यह सिद्ध होता है कि इनकी अपनी परम्परा की मूर्तियाँ थीं, जिनको यह पूजते थे। अगले वाक्यों में लिखा है कि सुलेमान की सात सौ स्त्रियाँ थीं, जब सुलेमान बूढा हुआ, तब उसकी स्त्रियों ने सुलेमान के दिल को दूसरे दुष्ट देवों की तरफ फेर दिया, तब खुदा सुलेमान पर बहुत क्रोधित हुआ, क्योंकि उसने उसे आज्ञा दी थी, कि वह पराये इष्टदेवों की पूजा न करे, इससे यह भी जाना गया है कि उनके घरों में उनकी औरतें प्रायः मूर्तियों की पूजा करती थीं, इससे यह भी मालुम होता है कि उनके अपने बुत भी थे, जिनकी वह पूजा करते थे, फिर लिखा है कि याकूब सुबह उठा और उस पत्थर को जिसको याकूब ने अपना माथा टेका बनाया हुआ था, उसे लेकर स्तम्भ की तरह खड़ा कर दिया, और उसके सिर पर तेल डाला और उस स्थान का नाम बैतेईल (खुदा का घर) रखा। फिर याकूब ने कहा यह पत्थर मैंने खड़ा किया है, इसका नाम खुदा का घर होगा।
--(उत्पत्ति पुस्तक अध्याय 25, पृष्ठ 62)
यही प्रथा आजकल जंगली भीलों में पाई जाती है कि वह जाते जाते रास्ते में एक पत्थर रख देते है, उस पत्थर पर तेल व सिन्दूर डालकर कहते हैं कि यह हमारा देवता है, ऐसे ही याकूब पत्थर खड़ा करके उस पत्थर को खुदा का घर बताता था। बाईबिल में मूर्तिपूजा का खण्डन आता है, वह दूसरों की मूर्तियों का है, अपनी मूर्तियों का नहीं।

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