गुरुवार, 5 जनवरी 2012

!! आर्य प्रजाति की आदिभूमि !!

मैं कई दिनों से देख रहा हु की फेसबुक में कुछ तथाकथित "मूल निवाशी "दिन भर चिल्लाते रहते है की आर्य बाहर  के है बिदेशी है ,और यहाँ की जनजातीय ही मूल निवाशी है ,मैं इन बातो को सिरे से नकार रहा हु ,फिर भी किसी को चिल्लाना है तो चिल्लाओ फाड़ो अपना गला और नष्ट करो अपनी उर्जा ,सच्चाई तो जो है ओ ये ही है की आर्य  प्रजाति की आदिभूमि के संबंध में अभी तक विद्वानों में बहुत मतभेद हैं। भाषावैज्ञानिक अध्ययन के प्रारंभ में प्राय: भाषा और प्रजाति को अभिन्न मानकर एकोद्भव (मोनोजेनिक) सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ और माना गया कि भारोपीय भाषाओं के बोलनेवाले के पूर्वज कहीं एक ही स्थान में रहते थे और वहीं से विभिन्न देशों में गए। भाषावैज्ञानिक साक्ष्यों की अपूर्णता और अनिश्चितता के कारण यह आदिभूमि कभी मध्य एशिया, कभी पामीर-कश्मीर, कभी आस्ट्रिया-हंगरी, कभी जर्मनी, कभी स्वीडन-नार्वे और आज दक्षिण रूस के घास के मैदानों में ढूँढ़ी जाती है। भाषा और प्रजाति अनिवार्य रूप से अभिन्न नहीं। आज आर्यों की विविध शाखाओं के बहूद्भव (पॉलिजेनिक) होने का सिद्धांत भी प्रचलित होता जा रहा है जिसके अनुसार यह आवश्यक नहीं कि आर्य-भाषा-परिवार की सभी जातियाँ एक ही मानववंश की रही हों। भाषा का ग्रहण तो संपर्क और प्रभाव से भी होता आया है, कई जातियों ने तो अपनी मूल भाषा छोड़कर विजातीय भाषा को पूर्णत: अपना लिया है। जहां तक भारतीय आर्यों के उद्गम का प्रश्न है, भारतीय साहित्य में उनके बाहर से आने के संबंध में एक भी उल्लेख नहीं है। कुछ लोगों ने परंपरा और अनुश्रुति के अनुसार मध्यदेश (स्थूण) (स्थाण्वीश्वर) तथा कजंगल (राजमहल की पहाड़ियां) और हिमालय तथा विंध्य के बीच का प्रदेश अथवा आर्यावर्त (उत्तर भारत) ही आर्यों की आदिभूमि माना है। पौराणिक परंपरा से विच्छिन्न केवल ऋग्वेद के आधार पर कुछ विद्वानों ने सप्तसिंधु (सीमांत एवं पंजाब) को आर्यों की आदिभूमि माना है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने ऋग्वेद में वर्णित दीर्घ अहोरात्र, प्रलंबित उषा आदि के आधार पर आर्यों की मूलभूमि को ध्रुवप्रदेश में माना था। बहुत से यूरोपीय विद्वान् और उनके अनुयायी भारतीय विद्वान् अब भी भारतीय आर्यों को बाहर से आया हुआ मानते हैं।
अब आर्यों के भारत के बाहर से आने का सिद्धान्त (AIT) गलत सिद्ध कर दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस सिद्धान्त का प्रतिपादन करके अंग्रेज़ और यूरोपीय लोग भारतीयों में यह भावना भरना चाहते थे कि भारतीय लोग पहले से ही गुलाम हैं। इसके अतिरिक्त अंग्रेज इसके द्वारा उत्तर भारतीयों (आर्यों) तथा दक्षिण भारतीयों (द्रविड़ों) में फूट डालना चाहते थे।
आर्य धर्म प्राचीन आर्यों का धर्म और श्रेष्ठ धर्म दोनों समझे जाते हैं। प्राचीन आर्यों के धर्म में प्रथमत: प्राकृतिक देवमण्डल की कल्पना है जो भारत, ईरान, यूनान, रोम, जर्मनी आदि सभी देशों में पाई जाती है। इसमें द्यौस् (आकाश) और पृथ्वी के बीच म...ें अनेक देवताओं की सृष्टि हुई है। भारतीय आर्यों का मूल धर्म ऋग्वेद में अभिव्यक्त है, ईरानियों का अवेस्ता में, यूनानियों का उलिसीज़ और ईलियद में। देवमंडल के साथ आर्य कर्मकांड का विकास हुआ जिसमें मंत्र, यज्ञ, श्राद्ध (पितरों की पूजा), अतिथि सत्कार आदि मुख्यत: सम्मिलित थे। आर्य आध्यात्मिक दर्शन (ब्राहृ, आत्मा, विश्व, मोक्ष आदि) और आर्य नीति (सामान्य, विशेष आदि) का विकास भी समानांतर हुआ। शुद्ध नैतिक आधार पर अवलंबित परंपरा विरोधी अवैदिक संप्रदायों-बौद्ध, जैन आदि-ने भी अपने धर्म को आर्य धर्म अथवा सद्धर्म कहा।

सामाजिक अर्थ में "आर्य' का प्रयोग पहले संपूर्ण मानव के अर्थ में होता था। कभी-कभी इसका प्रयोग सामान्य जनता विश के लिए ("अर्य' शब्द से) होता था। फिर अभिजात और श्रमिक वर्ग में अंतर दिखाने के लिए आर्य वर्ण और शूद्र वर्ण का प्रयोग होने लगा। फिर आर्यों ने अपनी सामाजिक व्यवस्था का आधार वर्ण को बनाया और समाज चार वर्णों में वृत्ति और श्रम के आधार पर विभक्त हुआ।

  
""आर्य संस्कृति पर अब भी हो रहे हैं शोध "" 
(जनमाध्यम, समाचार पत्र, लखनऊ, 1जनवरी,2012 पृष्ठ 9)
... यह निर्विवाद सत्य विश्व स्तर पर स्वीकार्य है कि आर्य बहुत ही ज्ञानी, विज्ञानी कौम है। लिहाज आर्यों पर दार्शनिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक शोध भी खूब हुये हैं। हैदराबाद के सेन्टर फार सेल्युलर एंड मालिक्यूलर बायोलाजी ने आर्य भारत के मूल निवासी हैं या नहीं...इस विषय पर आनुवांशिकी आधारित शोध कर यह निष्कर्ष निकाला है कि भारतीयों की कोशिकाओं का जो जेनेटिक ढ़ांचा हैं वह पाँच हजार बर्ष से भी अधिक पुराना है। इस आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि भारत के लोग (आर्य) भारत के मूल निवासी है...आर्यों का भारत आगमन 3500 वर्ष पूर्व हुआ था, यह अवधारणा गलत है। यदि मूल निवासी नहीं है तो वे 3500 वर्ष पूर्व नहीं बल्कि 5000 वर्ष से भी पहले भारत आये थे। जलवायु परिवर्तन के अनुसार 125 से 150 वर्षों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर विस्थापित मानव का चौथी -पाँचवीं पीढ़ी में जेनेटिक ढ़ांचा बदल जाता है।अंग्रेजो ने हमेशा से ही फुट डालो और शासन करो की नीत पर चले थे  उसी का परिणाम है की देश २०० वर्षो तक गुलाम रहा ,और आज भी कुछ तथाकथित "मूल निवाशी " हम लोगो के बीच में अलगाव की भावना रोपित कर रहे है ,पर उनके मनसूबे कभी भी पुरे नहीं होगे ,,जय जय श्री राम ...........
http://htcedws.blogspot.in/2012/01/blog-post_864.html 
http://timesofindia.indiatimes.com/india/Aryan-Dravidian-divide-a-myth-Study/articleshow/5053274.cms?intenttarget=no 

1 टिप्पणी: