सोमवार, 12 दिसंबर 2011

दलितों को गले लगा लो अन्यथा.?


                                 !!दलित महान हिन्दू हैं !!

ज़रा सोचिये मुसलमानों के राज्य में आज दलित भाइयो के पुरखो को हिन्दू होने के कारन 

मुसलमानों के कितने अत्याचार सहने पड़े होंगे ,इन दलित भाइयो ने अपमान सहन किया, साथ 
ही हिन्दू धर्म में भी अपमान सहना पड़ा !
आज के दलित कहे जाने वालो के पुरखो ने अपने धर्म की रक्षा के लिए कितनी तपस्या की होगी !
मैं उन तपस्वी महापुरषों और उनकी संतानों को महान हिन्दू कहकर करोड़ो बार प्रणाम करता हूँ ! 
इन महान हिन्दुओ के सम्मान के साथ, साथ लिए बिना हिन्दू एकता और हिन्दू रक्षा की बात 
सोचना भी मुर्खता है ! जय श्री राम ,दलित महान आर्य है !! दलितों को यदि  न्याय नहीं मिलेगा तो वे सब हिन्दू धर्म त्यागकर कोई अन्य धर्म स्वीकार कर लेंगे. संघ परिवार अपने आप को हिन्दू धर्म का संरक्षक मानता है और कहता है कि ''गर्व से कहो हम हिन्दू हैं'' तो उसे उन कारणों को दूर करना चाहिए जिनके चलते एक दलित दूल्हा घोड़ी पर सवार हो जाता है तो उसे घोड़ी से उतारकर नीचे पटक दिया जाता है, दलितों को उस कुएं से पानी नहीं लेने दिया जाता है जिससे सवर्ण पानी भरते हैं, यदि गांव का कोई नाई किसी दलित की दाढ़ी बना देता है तो गांव के सारे सवर्ण उसका बहिष्कार कर देते हैं, यदि किसी दलित को सरकारी जमीन मिल जाती है तो गांव के दादा उसे उस जमीन पर खेती नहीं करने देते, यदि वह मरे पशुओं की लाश ठिकाने नहीं लगाता तो उसके साथ मार-पीट की जाती है, दलित बच्चों को स्कूलों में सवर्ण बच्चों से अलग बैठाया जाता है, यदि किसी दलित महिला ने स्कूल में दोपहर का भोजन पका दिया तो गांव के सवर्ण बच्चे उस भोजन को खाने से इंकार कर देते हैं. इस तरह कदम-कदम पर दलितों को अपमानित एवं जलील किया जाता है.क्या यह जायज है ?
स्वामी विवेकानन्द, जिनसे बड़ा हिन्दू कोई हो ही नहीं सकता, और जिनका नाम संघ परिवार दिन-रात जपता रहता है, ने चेतावनी दी थी कि
''उठो! आगे बढ़ो! और दलितों को गले लगा लो अन्यथा वे तुम्हारी लाशों पर नाचेंगे.'' क्या हम स्वामी विवेकानंद की इस चेतावनी की आज तक उपेक्षा नहीं कर रहे हैं?
इसी तरह, देश के एक और महान महात्मा गांधी ने दलितों को समान अधिकार दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किए. यहां तक कि उन्हें हरिजन अर्थात हरि (ईश्वर) के जन का ओहदा दिया. अनेक अन्य महान हिन्दुओं, जिनमें डॉ अम्बेडकर, ज्योतिबा फुले आदि शामिल हैं, ने भी दलितों के उन्नयन के लिए कार्य किया. जब डॉ अम्बेडकर को अपने प्रयासों में सफलता नहीं मिली तो उन्होंने अंतत: हिन्दू धर्म को त्याग दियाऔर बौध्ध धर्म अपना हजारो दलितों के साथ . हम सबको यह सोचना होगा कि कैसे इस तरह के प्रयास किए जाएं जिससे दलितों को कोई अन्य धर्म गले न लगाना पड़े एक बार सभी सोचे !
 नोट ..लेख अभी पूर्ण नहीं है ,अभी आगे लिखना है

2 टिप्‍पणियां:

  1. भगवान् ने तो सब को मानव ही बनाया है, प्रत्येक मानव में हरी स्वये विराजमान है, तो कोई दो व्यक्ति अलग अलग पदवी के कैसे हो सकते है? निर्धन एवं धनवान तो हो सकता है ,जिसमे धनवान व्यक्ति निर्धनों को सहायता (दान धर्म) करते है ! किन्तु ये शूद्र हरिजन दलित एवं जाती वाचक शब्द किस ने रचे ? थोड़े से लोभ के चलते लोग ने स्वये इन जाती वाचक नामो को अपनाया,जो आगे चल कर अनुदान एवं आरक्षण के रूप में उनको लाभकारी लगे ! दान तो हाथ फैला कर ही लिया जाता है अधिकार से नहीं ? रही बात गले लगाने की तो आज भाई भाई का और बेटा बाप का गला काट रहा है ?बेगानों से क्या उमींद करनी !.....

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  2. गले लगाने से मेरा मतलब है की जातिगत भेदभाव बंद करना है !

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